Saturday, 27 August 2016

Create Unlimited Gmail IDs Using One Gmail ID

How to create unlimited gmail ids.


Method 1 :- Googlemail domain name

  • For example your Gmail Id is abc@gmail.com 
  • Then your second gmail id will be abc@googlemail.com
  • So now if anyone is sending an email to abc@googlemail.com. It will also be delivered to abc@gmail.com

Method 2:- Gmail does not consider dot(.) 

  • In the Gmail id dot(.) does not matter, for example your gmail id is abc@gmail.com now you can add as many dots as you can and create unlimited gmail ids.
  • Examples a.bc@gmail.com
  • ab.c@gmail.com
  • abc.@gmail.com
  • ab..c@gmail.com
  • So all the email sent to a.bc@gmail.com,ab.c@gmail.com,ab..c@gmail.com will also be delivered at abc@gmail.com

Method 3:- Unlimited Ids by adding + anything to your email id

  • By using this method you can create unlimited gmail id by + anything at the last of your email id for example lets say your email Id is abc@gmail.com Now add + symbol
  • Examples:- abc+anything@gmail.com
  • abc+jdkjf48@gmail.com
  • abc+9dj9993898@gmail.com
  • So now also all the email sent to abc+anything@gmail.com, abc+jdkjf48@gmail.com, abc+9dj9993898@gmail.com will be delivered to abc@gmail.com

Benefits :- Sign up on any website using one Gmail Id.

  1. Say you want to sign up on Amazon, Flipkart or any other website but you have already used your gmail id then create unlimited Id using any of above method and sign up to any website and Enjoy the benefit.

What Do You Think:-

  • Hope you guys liked this post and Do testing and let me know your result if it is working or not, Write it in comments section. And Don't forget to like it and share it.
  • Thank You

Wednesday, 24 August 2016

छोटी उम्र में महान कार्य करने वाले भारतीय



🔴 विवेकानंद: 39 साल का पूरा जीवन और 32 साल की उम्र मे पूरे विश्व मे हिन्दुत्व का डंका बजाने वाले निर्विवाद भारतीय महापुरुष।

🔵 रानी लक्ष्मी बाई: 30 साल की उम्र मे अंग्रेज़ो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झाँसी की रानी।

🔴 भगत सिंह: 23 वर्ष की अल्पायु मे बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च, 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।


🔵 खुदीराम बोस: भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 19 साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे।

🔴 करतार सिंह साराभा: 19 साल की उम्र मे लाहौर कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा। देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

🔵 अशफाक़ उल्ला खाँ: 27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणो की आहुती देने वाले वीर हुतात्मा।

🔴 उधम सिंह: 14 साल की उम्र से लिए अपने प्रण को उन्होने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।

🔵 गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 साल की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान।

🔴 राजगुरु: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । 23 साल की उम्र मे इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

🔵 सुखदेव: 33 साल की अल्पायु मे 23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।

🔴 चन्द्रशेखर आजाद : 25 साल की उम्र मे बलिदान : चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वरतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।

🔵 मंगल पांडे: सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। क्रांति के समय और फांसी दिये जाने के समय इनकी उम्र 30 साल थी।


🔴 राम प्रसाद ‘बिस्मिल’: काकोरी कांड के क्रांतिकारी । 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज़ सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

Sunday, 21 August 2016

10 प्रेरणादायक कहानियां, जो आपको भी जीना सिखा देंगी


10 Inspirational Stories in Hindi : – ये कहानियां उन लोगों की है, जिन्होंने मुश्किलों पर जीत दर्ज की है। अपनी अलग राह बनाई है। इन किरदारों ने ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसे जानने के बाद आप अपने जीवन की कमियां भी भूल जाएंगे। इनमें से कई ऐसे हैं, जो दिव्यांग हैं, लेकिन उनकी पहचान आज इससे कहीं ज्यादा है। कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने कमियों के बाद भी सोसाइटी के लिए मिसाल पेश की है। हर आम और खास के लिए यह कहानियां किसी प्रेरणा से कम नहीं। सबने साबित किया है-ज़िद हो, तो दुनिया बदलने में देर नहीं लगती। सबसे पहले जेसिका कॉक्स के बारे में-


1. जेसिका कॉक्स (Jessica Cocks)
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हाथों से नहीं, पैरों से हवा में उड़ान भरती हैं जेसिका- अमेरिका के एरिज़ोना में जन्मी और वहीं रहने वाली जेसिका कोक्स (32) जन्म से अपंग हैं। उनके दोनों हाथ नहीं थे, इसके बावजूद वह पायलट है। बिना हाथों वाली वह दुनिया की पहली पायलट है, जो हाथों से नहीं, पैरों से प्लेन उड़ाती हैं।लेकिन यह कमजोरी ही उनकी ताकत बनी। आज जेसिका वो सभी काम कर सकती हैं और करती हैं, जो आम लोग भी नहीं कर पाते। उनके पास ‘नो रिस्टिक्शन’ ड्राइविंग लाइसेंस है। जिस विमान को जेसिका उड़ाती है उसका नाम ‘एरकूप’ है। जेसिका के पास 89 घंटे विमान उड़ाने का एक्सपीरियंस है।
जेसिका डांसर भी रह चुकी हैं और ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट भी हैं। वे 25 शब्द प्रति मिनट से टाइपिंग भी कर सकती हैं। जेसिका पर एक डॉक्युमेंट्री भी बन चुकी हैं ‘राइट फुटेड’ जिसे डायरेक्ट किया है एमी अवॉर्ड विनर ‘निक स्पार्क’ ने।
2. स्मीनू जिंदल (Sminu Jindal)
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11 साल में खोए थे पैर, आज अपनी कंपनी की MD हैं स्मीनू जिंदल- जिंदल फैमिली की स्मीनू उन दिव्यांगों के लिए आदर्श हैं जो जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहते हैं। स्मीनू ने अपनी विकलांगता को अवसर माना और अपनी ऐसी पहचान बनाई कि आज उनकी व्हीलचेयर खुद को लाचार समझती है।आज स्मीनू जिंदल ग्रुप की कंपनी जिंदल सॉ लिमिटेड की एमडी हैं। उनका ‘स्वयं’ एनजीओ भी है। स्मीनू जब 11 साल की थीं, तब जयपुर के महारानी गायत्री देवी स्कूल में पढ़ती थीं। छुट्टियों में दिल्ली वापस आ रही थीं, तभी कार एक्सीडेंट हुआ और वह गंभीर स्पाइनल इंजरी की शिकार हो गई। हादसे के बाद उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया और व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा।
स्मीनू बताती हैं, अपने रिहैबिलिटेशन के बाद जब मैं इंडिया वापस आई तो काफी कुछ बदल चुका था। मैंने मायूस होकर पिताजी से कहा था कि मैं स्कूल नहीं जाऊंगी, पर पिताजी ने जोर देकर मुझसे कहा कि तुम्हें अपने बहनों की तरह ही स्कूल जाना पड़ेगा। आज मेरे पति और बच्चों के लिए भी मेरी विकलांगता कोई मायने नहीं रखती।
स्मीनू कहती है- ‘आपको आपका काम स्पेशल बनाता है न कि आपकी स्पेशल कंडीशन। मेरे जैसे जो भी लोग हैं, उन्हें यही कहूंगी- खुद की अलग पहचान बनाने के लिए अपनी कमी को आड़े न आने दें, यही कमी आगे चलकर आपकी बड़ी खासियत बन जाएगी।”
स्मीनू का एनजीओ ‘स्वयं’ आज NDMC, ASI, DTC और दिल्ली शिक्षा विभाग के साथ मिलकर कई काम कर रहा है।
3. ली जुहोंग (Li Zhong)
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बचपन में पैर खोए, फिर भी डॉक्टर बनीं, अब इलाज करने रोज करती है पहाड़ पार- चीन के चांगक्वींग की रहने वाली ली जुहोंग जब 4 साल की थीं तो एक रोड एक्सीडेंट दोनों पैर गंवाने पड़े। बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बन कर आज पहाड़ी गांव में क्लीनिक खोलकर लोगों की सेवा कर रही है।-1983 में एक ट्रक ने ली को टक्कर मार दी। दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे।
– डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर जूहोंग के दोनों पैर घुटने के ऊपर से काट दिए।
– ठीक होने के बाद होंगजू ने लकड़ी के स्टूल के सहारे चलना सीखा। शुरुआत में उन्हें लगा कि वह चल नहीं पाएंगी।
– आठ साल की उम्र में चलना सीख लिया। इसके बाद फिर से स्कूल जाना शुरू किया।
– 2000 में स्पेशल वोकेशनल स्कूल में मेडिकल स्टडी के लिए एडमिशन लिया और डिग्री हासिल की।
– इसके बाद गांव वालडियन में क्लीनिक खोलकर ग्रामीणों का इलाज शुरू किया।
– जुहोंग इमरजेंसी कॉल आने पर मरीज को घर पर भी देखने जाती हैं। उन्हें अक्सर ऊंचे-नीचे रास्तों से जाना होता है।
क्लीनिक खोलने के कुछ दिनों बाद ही होंगजू की शिंजियान से मुलाकात हुई। दोनों में प्यार हुआ और फिर शादी कर ली। शिंजियान ने नौकरी छोड़कर घर की पूरी जिम्मेदारी संभाली। शिंजियान पीठ पर बैठाकर जुहोंग को क्लीनिक तक छोड़ने जाते हैं। ली अब तक 1000 से अधिक लोगों का इलाज कर चुकी हैं।
4. मुस्कान अहिरवार (Muskan Ahirwar) : –
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9 साल की बच्ची गरीब बच्चों के लिए चलाती है लाइब्रेरी- भोपाल में एक 9 साल की बच्ची मुस्कान अहिरवार गरीब बच्चों के लिए ‘बाल पुस्तकालय’ नाम से एक लाइब्रेरी चलाती है। तीसरी क्लास में पढ़ने वाली मुस्कान के पास फिलहाल 119 किताबें हैं। मुस्कान रोज़ाना इस लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।भोपाल के अरेरा हिल्स के पास बने स्लम एरिया में रहने वाली मुस्कान की मां हाउस वाइफ हैं और पिता बढ़ई। मुस्कान की बड़ी बहन 7वीं में पढ़ती है। लाइब्रेरी के लिए मुस्कान हर दिन 4 बजे शाम में स्कूल से घर आती है फिर उसके बाद अपने घर के बाहर किताबें सजाती हैं और कहानियां सुनाकर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
सरकार से मिली मदद
पिछले साल राज्य शिक्षा केंद्र ने उसे 25 किताबें दी थी। इन किताबों की संख्या अब बढ़कर 119 हो गई है। राज्य शिक्षा केंद्र ने अब उसे यह लाइब्रेरी संभालने की जिम्मेदारी दी है। अब मुस्कान और स्लम के बच्चे शिक्षा केंद्र से और किताबों की मांग करने जा रहे हैं, क्योंकि अब तक की सभी किताबें बच्चे पढ़ चुके हैं। शायद मुस्कान भारत की सबसे कम उम्र की लाइब्रेरियन है।
5. रेखा (Rekha)
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खेतों में हल चलाकर इस महिला ने बना दिया रिकॉर्ड- पति की असमय मौत के बाद मुरैना जिले में पहाड़गढ़ के पास गांव जलालपुरा की एक महिला ने खेत में खुद हल चलाकर नेशनल रिकॉर्ड बना दिया। उसे समाज के लोग विधवा कहकर घर पर बैठने की हिदायत दे रहे थे लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी। आज रेखा अपने खेत में आधुनिक तौर-तरीके से खेती करती हैं और पैदावार भी काफी बढ़ा ली।- महज 1 हेक्टेयर के खेत में 50 क्विंटल बाजरा पैदा कर नया रिकॉर्ड बनाया, क्योंकि अब तक नेशनल एवरेज 15 क्विंटल था।
– रेखा की इस उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय कृषि-कर्मण अवॉर्ड के लिए सम्मानित किया है।
– पति की जब मौत हुई तो समाज ने रेखा को विधवा कह कर घर बैठने की हिदायत दी थी। कंधों पर दो बेटियों और एक बेटे की जिम्मेदारी थी और गुजारे के नाम पर महज 1 हेक्टेयर का खेत। इसी के सहारे परिवार पालना था।
– खुद अपनी खेती को संभालने बाहर निकली तो रेखा को समाज से भी जंग लड़नी पड़ी।
– समाज के असहयोग के चलते कई बार तो गृहस्थी के काम के साथ खुद रेखा को खेतों में हल भी चलाना पड़ा। आखिरकार रेखा की जिद कामयाब हो गई है, अब गांव के लोग भी रेखा पर गर्व कर रहे हैं।
6. रोमन सैनी (Roman Saini)
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IAS बने थे रोमन, गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए छोड़ दी नौकरी- राजस्थान के रोमन सैनी यूं तो IAS सिलेक्ट हुए थे, लेकिन गरीब बच्चों को पढ़ाने की इच्छा के चलते उन्होंने नौकरी छोड़ दी। ट्रेनिंग के दौरान मप्र के जबलपुर में सहायक कलेक्टर पदस्थ रहे रोमन ने इस्तीफा दे दिया और अब वे दिल्ली में गरीब व मध्यमवर्गीय बच्चों को पढ़ा रहे हैं।- 2014 बैच के आईएएस रोमन राजस्थान के रायकरनपुरा गांव निवासी हैं और महज 23 साल के हैं।
– उन्होंने 16 साल में एम्स में दाखिले का टेस्ट पास किया, जहां 18वीं रैंक आई।
– डॉक्टरी के बाद IAS एक्ज़ाम में बैठे, तो पहली बार में चुने गए।
– रोमन के पिता इंजीनियर और मां हाउस वाइफ हैं।
– उनकी पहली पोस्टिंग जून 2015 में जबलपुर में सहायक कलेक्टर के रूप में हुई थी।
– वह सिर्फ चार महीने ही सर्विस कर पाए और दिल्ली चले गए। वहां से उन्होंने इस्तीफा भेज दिया, जो इसी जनवरी मंजूर हो गया।
रोमन ने एजुकेशन स्टार्ट-अप अन-एकेडमी की शुरुआत की। इसकी शुरुआत वर्ष 2011 में यू-ट्यूब चैनल के रूप में हुई थी। इसे रोमन के दोस्त गौरव मुंजाल ने बनाया था। रोमन और गौरव 11वीं क्लास में थे, तो साथ ट्यूशन जाते थे। उसी समय उन्हें यह आइडिया आया कि हर बच्चे को अच्छी ट्यूशन मिले। दो और दोस्तों हेमेश और सचिन के साथ मिलकर उन्होंने अन-एकेडमी डॉट इन नाम से वेब प्लैटफॉर्म लॉन्च किया।
7. रंगोली (Rangoli)
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एसिड अटैक के बाद और मजबूत हुईं कंगना की बहन रंगोली- कंगना रनोट को सब जानते हैं, लेकिन हाल ही में दुनिया उनकी बहन रंगोली से मिली। रंगोली 2006 में एसिड अटैक की शिकार हुईं, जिसके बाद उनकी एक-दो नहीं, 57 बार सर्जरी हुई। मंगेतर छोड़ गया, तीन महीने तक आईना नहीं देखा। बावजूद इसके रंगोली ने हिम्मत नहीं हारी और अब वह एक फेमस वुमन्स मैगजीन के कवर पर कंगना के साथ दिखेंगी। जिंदगी को फिर से जीने की ज़िद ही उन्हें यहां तक लेकर आई है।- रंगोली की आंखकी 90% रोशनी चली गई है। उनका ब्रेस्ट खराब हो चुका है।
– कंगना ने बताया, “जब भी मेरे मां-बाप उसकी ओर देखते थे, वे बेहोश हो जाते थे। उसका मंगेतर एयरफोर्स में था, वह भी भाग गया। बाद में उसे चाइल्ड हुड फ्रेंड अजय से प्यार हो गया।
– अजय और रंगोली शादी की प्लानिंग कर रहे थे, तब वह उस दुख से दूर निकल चुकी थी। मैंने उससे पूछा कि अगर यह शादी नहीं हो पाई तो उसने तुरंत जवाब दिया, नहीं होनी होगी, तो नहीं होगी। वह बेहद टफ और इन्स्पिरेशनल थी।”
8. पहड़ा राजा सिमोन उरांव (Jharkhand’s Waterman Simon Oraon) – 
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जिद ऐसी कि बना दिए तीन बांध,बदल दी 5 गांवों की किस्मत- आप दशरथ मांझी के बारे में तो जानते ही होंगे। झारखंड में भी ऐसा ही कुछ हुआ। यहां एक व्यक्ति ने छोटी-छोटी नहरों को मिलाकर तीन बांध बना डाले। आज इन्हीं बांधों से करीब 5000 फीट लंबी नहर निकालकर खेतों तक पानी पहुंचाया जा रहा। हम बात कर रहे हैं इसी साल पद्मश्री पाने वाले 83 वर्षीय पहड़ा राजा सिमोन उरांव की।
– पहड़ा राजा का कॉपी-किताब से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। न कोई तकनीक और न ही हाथ में पैसे।
– उनके पास था तो सिर्फ जिद और कुछ कर गुजरने का जज्बा। सूखे खेतों तक पानी पहुंचाने की जिद। नारा दिया, जमीन से लड़ो, मनुष्य से नहीं।
– रांची में रहने वाले पहड़ा राजा सिमोन उरांव अब भी कुदाल लेकर कभी खेतों में नजर आते हैं, तो कभी गांव वालों का झगड़ा सुलझाते हुए।
– बाबा के नाम से प्रसिद्ध सिमोन की बनाए बांधों से पांच गांवों की सूरत बदल गई है।
– एक ब्लॉक की यह कहानी पूरे झारखंड के लिए मिसाल बन गई। सिंचाई सुविधा के अभाव में जहां एक फसल के लाले थे, वहां साल में तीन फसलें उगाई जाने लगीं।
रोगियों का करते हैं इलाज –
सिमोन ने ग्रामीणों की आर्थिक समस्याएं दूर करने के लिए फंड बनाया। बैंक में खाता खुलवाया।
– अब ग्रामीणों को जरूरत के समय इसी फंड से 10-10 हजार रुपए की सहायता दी जाती है।
– किसी गरीब की बेटी की शादी हो, तो दो-दो क्विंटल चावल भी दिया जाता है। वे देशी जड़ी-बूटी से रोगियों का इलाज भी करते हैं।
9. सुनील पटेल (Sunil Patel) : –
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दिव्यांग है सुनील, फिर भी लेट कर दे रहा बच्चों को फ्री ट्यूशन- एक हादसे में निःशक्त होने के बाद 16 साल से बिस्तर पर ही जिंदगी गुजार रहे सुनील पटेल का हौसला आज भी काबिले-तारीफ है। सुनील बिस्तर पर लेटकर ही 10वीं और 12वीं के बच्चों को फ्री ट्यूशन दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के छोटे- से विकासखंड नगरी के गांव सांकरा छिंदपारा में रहने वाले सुनील बीते 2 साल से गांव के बच्चों को ट्यूशन दे रहे हैं। वे कहते हैं, मैं खुश हूं कि ऐसा कर पा रहा हूं।- सुनील के साथ हादसा सन 2000 में हुआ था। वह अपने दोस्तों के साथ आम तोड़ने गए थे। पेड़ में चढ़कर आम तोड़ते वक्त संतुलन बिगड़ने से वह अचानक जमीन पर गिर गए।
– सुनील के पिता झगरू राम पटेल और मां सरोज बाई ने अपने बेटे के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी।
– 2 एकड़ कृषि भूमि में से आधा एकड़ खेत को बेचकर इलाज में खर्च कर डाला।
– फिर भी डॉक्टरों ने यह जवाब दिया कि सुनील अब जीवनभर चल नहीं पाएगा। मजबूरन सुनील को अपने हालत से समझौता करना पड़ा।
– फिलहाल बोर्ड एग्जाम के चलते ट्यूशन बंद है फिर भी पेपर के बाद बच्चे आते हैं और सुनील उन्हें गाइड करते हैं।
10. चेन जिफेंग (Chain Zifeng) : –
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जन्म से नहीं थे हाथ, पैर की उंगलियों से कमाते हैं आज 3 लाख महीना- चेन जिफेंग के जन्म से ही हाथ नहीं हैं। उसके पेरेंट्स इस बात से परेशान थे कि वह आगे कैसे बढ़ेगा। लेकिन चेन आज सक्सेसफुल ई-कॉमर्स वेबसाइट का मालिक है और उसकी कमाई लाखों में हो रही है। यह सब उसके पैरों की उंगलियों का कमाल है।- चीन में हुबेई प्रॉविन्स के बोडोंग काउंटी में 27 साल का चेन जिफेंग अपनी फैमिली के साथ रहते हैं।
– हाथ न होने के बावजूद उन्होंने पैरों की उंगलियों को ताकत बनाया है। वह रोजमर्रा के सारे काम पैरों से करते हैं।
– वह खाना बनाने से लेकर लकड़ी काटने तक हर काम में पेरेंट्स की मदद करते हैं।
– चेन ने एक ऑनलाइन स्टोर खोला है। इसकी दस दिनों की कमाई 10 हजार युआन यानी एक लाख रुपए हो गई है।
– यह कमाई इस इलाके में एवरेज मंथली सैलरी (41 हजार रु) से भी दोगुनी है।
– वह देर रात तक अपने कस्टमर्स से बात करते हैं और उनके फीडबैक भी लेते हैं।

Friday, 19 August 2016

PV Sindhu Makes History By Entering Finals Of Women’s Badminton Singles

Indian badminton player PV Sindhu made history by entering the final of the women’s singles event in Olympics after defeating Japan’s Nozomi Okuhara.

She beat Okuhara by 21-19, 21-10 in the semi-final. Her final showdown will be with World No.1 Carolina Marin. Soon after victory, Sindhu told : “My target is gold and I promise to play my heart out against Carolina Marin.”

India's Sindhu Pusarla plays Japan's Nozomi Okuhara during a women's singles semifinal match at the 2016 Summer Olympics in Rio de Janeiro AP
India’s Sindhu Pusarla plays Japan’s Nozomi Okuhara during a women’s singles semifinal match at the 2016 Summer Olympics in Rio de Janeiro AP

This will be the first time India will ever India will contest in an Olympics Badminton final.


Earlier, Saina Nehwal had won a bronze in the London Olympics four years back.

Thursday, 11 August 2016

30 Facts about Indian National Flag (Tiranga) : तिरंगे से जुड़े 30 फैक्ट्स


30 Facts about Indian National Flag (Tiranga) in Hindi
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1. क्या आप जानते हैं कि देश में ‘फ्लैग कोड ऑफ इंडिया’ (भारतीय ध्वज संहिता) नाम का एक कानून है, जिसमें तिरंगे को फहराने के कुछ नियम-कायदे निर्धारित किए गए हैं।
2. यदि कोई शख्स ‘फ्लैग कोड ऑफ इंडिया’ के तहत गलत तरीके से तिरंगा फहराने का दोषी पाया जाता है तो उसे जेल भी हो सकती है। इसकी अवधि तीन साल तक बढ़ाई जा सकती है या जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों भी हो सकते हैं।
3. तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए।  प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है।
4. किसी भी स्तिथि में फटे या क्षतिग्रस्त झंडे को नहीं फहराया जा सकता है।
5. तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टेंगल शेप में ही होगा। जिसका अनुपात 3 : 2 ही होना चाहिए।
6. झंडे का यूज़ किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट के सामान में नहीं हो सकता।
7. झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है।
8. किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा यूज़ नहीं किया जा सकता है।  इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने में भी नहीं किया जा सकता है।
9. किसी भी स्तिथि में झंडा (तिरंगा) जमीन पर टच नहीं होना चाहिए।
10. जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।
11. झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
12. किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते है।
13. जब तिरंगा फट जाए या रंग उड़ जाए तो इसे फहराया नहीं जा सकता। ऐसा करना राष्ट्रध्वज का अपमान करने वाला अपराध माना जाता है।
14. जब तिरंगा फट जाता है तब इसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।
15. शहीदों के पार्थिव शरीर से उतारे गए झंडे को भी गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या नदी में जल समाधि दी जाती है।
16. सबसे पहले लाल, पीले व हरे रंग की हॉरिजॉन्टल पट्टियों पर बने झंडे को 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क), कोलकाता में फहराया गया था।
17. भारत के राष्ट्रीय ध्वज को पिंगली वैंकेया ने डिज़ाइन किया था।
18. अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। इससे पहले इसमें 6 बार बदलाव किया गया था।
19. 3 हिस्से से बने झंडे में सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद और नीचे हरे रंग की एक बराबर पट्टियां होती है। झंडे की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 2 और 3 का होता है।
21. सफ़ेद पट्टी के बीच में गहरे नीले रंग का एक चक्र होता है।  इसका व्यास लगभग सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तिलियां बनी होती हैं।
22. 22 जुलाई 1947 से पहले तिरंगे के बीच में चक्र की जगह पर चरखा होता था।  इस झंडे को 1931 में अपनाया गया था।
23. 26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्वज संहिता में एमेंडमेंट किया गया।  इसके बाद लोगों को अपने घरों और ऑफिस में आम दिनों में तिरंगा फहराने की अनुमति मिल गई।
24. झारखंड की राजधानी रांची में 23 जनवरी 2016 को सबसे ऊंचा तिरंगा फहराया गया।  66*99 साइज के इस तिरंगे को जमीन से 493 फ़ीट ऊँचाई पर फहराया गया।
25. राष्ट्रपति भवन के म्यूज़ियम में एक छोटा तिरंगा रखा हुआ है, जिसे सोने के स्तंभ पर हीरे-जवाहरातों से जड़ कर बनाया गया है।
26. भारत में बैंगलुरू से 420 किमी स्थित ”’हुबली”’ एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है।
27. 29 मई 1953 में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे ऊंची पर्वत की चोटी माउंट एवरेस्ट पर यूनियन जैक तथा नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराता नजर आया था इस समय शेरपा तेनजिंग और एडमंड माउंट हिलेरी ने एवरेस्ट फतह की थी।
28. पहली बार 21 अप्रैल 1996 के दिन स्क्वाड्रन लीडर संजय थापर ने तिरंगे की शान बढाते हुए एम. आई.-8 हेलिकॉप्टर से 10000 फीट की ऊंचाई से कूदकर देश के झंडे को उत्तरी ध्रुव में फहराया था।
29. 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा ने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को लेकर अंतरिक्ष के लिए पहली उड़ान भरी थी।
30. दिसंबर 2014 से चेन्नई में 50,000 स्वयंसेवकों द्वारा मानव झंडा बनाने का विश्व रिकॉर्ड भी भारतीयों के पास ही है।

Wednesday, 3 August 2016

Karoly Takacs – जिसने अपनी इच्छाशक्ति से बनाया था इतिहास

Karoly Takacs Motivational Story in Hindi : इस संसार में कुछ ऐसे भी लोग हुए है जिन्होंने अपनी असीम  इच्छाशक्ति से ऐसे कामो को अंजाम दिया जो की औरो के लिए असंभव थे।  ऐसे ही एक शख्स थे  “Karoly Takacs”.  Karoly, Hungarian Army में काम करते थे।  वह एक बहतरीन पिस्टल शूटर थे।  उन्होंने 1938 के नेशनल गेम्स में बहतरीन प्रदर्शन करते हुए परतियोगिता जीती थी।  उनके प्रदर्शन को देखते हुए पुरे हंगरी वासियों को विश्वास हो गया था की 1940 के ओलंपिक्स में Karoly देश के लिए गोल्ड मैडल जीतेगा।

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पर कहते है की होनी को कुछ और ही मंजूर होता है ऐसा ही Karoly के साथ हुआ।1938 के नेशनल गेम्स के तुरंत बाद, एक दिन आर्मी ट्रेनिंग कैंप में Karoly के सीधे हाथ में ग्रेनेड फट जाता है। Karoly का वो हाथ, जिसे उसने बचपन से ट्रेंड किया था, हमेशा के लिए शरीर से अलग हो जाता है। सारा हंगरी गम में डूब जाता है।  उनका ओलंपिक्स गोल्ड मैडल का सपना खतम हो जाता है।  दूसरी तरफ Karoly हार नहीं मानता है। उसे, अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य के अलावा कुछ नज़र नहीं आता है।  इसलिए वो किसी को बिना बताये अपने लेफ्ट हैण्ड से प्रैक्टिस शुरू कर देता है। इसके लगभग एक साल बाद 1939 के नेशनल गेम्स में वो लोगो के सामने आता है, और गेम्स में भाग लेने की बात कहकर सबको आश्चर्य में दाल देता है। उसे गेम्स में भाग लेने की इज़ाज़त मिलती है, वो पिस्टल शूटिंग में भाग लेता है और चमत्कार करते हुए गोल्ड मैडल जीत लेता है।
लोग अचंभित रहे जाते है, आखिर ये कैसे हो गया। जीस हाथ से वो एक साल पहले तक लिख भी नहीं सकता था, उसे उसने इतना ट्रेन्ड कैसे कर लिया की वो गोल्ड मैडल जीत गया।  लोगो के लिए ये एक miracle था Karoly को देश विदेश में खूब सम्मान मिला।  पुरे हंगरी को फिर विश्वास हो गया की 1940 के ओलंपिक्स में पिस्टल शूटिंग का गोल्ड मैडल Karoly ही जीतेगा। पर वक़्त ने फिर Karoly के साथ खेल खेला और 1940 के ओलंपिक्स वर्ल्ड वार के कारण कैंसिल हो गए।
Karoly निराशा नहीं हुआ उसने अपना पूरा ध्यान 1944 के ओलंपिक्स पर लगा दिया।  पर वक़्त तो जैसे उसके धीरज की परीक्षा लेने के लिए आतुर था 1944 के ओलंपिक्स भी वर्ल्ड वार के कारण कैंसिल हो गए।
एक बार फिर हंगरी वासियों का विश्वास डगमगाने लगा क्योकि Karoly की उम्र बढती  जा रही थी। खेलो में उम्र और परदर्शन का गहरा रिश्ता होता है। एक उम्र के बाद आपके परदर्शन में कमी आने लगती है।  पर Karoly का सिर्फ एक ही लक्ष्य था पिस्टल शूटिंग में ओलंपिक्स में गोल्ड मैडल  इसलिए उसने निरंतर अभ्यास जारी रखा।  आख़िरकार 1948 के ओलंपिक्स आयोजित हुए, Karoly ने उसमे हिस्सा लिया और अपने देश के लिए पिस्टल शूटिंग का गोल्ड मैडल जीता।  सारा हंगरी खुसी से झूम उठा, क्योकि Karoly ने वो कर दिखाया जो और के लिए असंभव था। पर Karoly यही नहीं रुका उसने 1952 के ओलंपिक्स में भी भाग लिया और वहा  भी गोल्ड मैडल जीत कर इतिहास बना दिया। Karoly उस पिस्टल इवेंट में लगातार दो गोल्ड मैडल जीतने वाला पहला खिलाडी बना ।
दोस्तों यह थी Karoly की कहानी जिसने अपनी असीम इच्छासक्ति से वो कर के दिखाया जिसके बारे में आप और हम सोच भी नहीं सकते। सोचो यदि हमारे साथ ऐसा होता तो हम क्या करते, शायद हम पूरी जिन्दगी अपनी किस्मत और भगवान् को दोष देते रहते।  पर Karoly ने ऐसा कुछ भी नहीं किया उसने अपना पूरा ध्यान अपने टारगेट पर लगाया।
इसलिए दोस्तों, जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर आपको लगे की वक़्त और परिस्थितिया आपका साथ नहीं दे रहे, आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में तो एक बार Karoly, उसके संधर्ष, उसकी  इच्छाशक्ति के बारे में जरुर सोचना।

Wednesday, 27 July 2016

Running VS Walking: Which is Better?

Running and walking are fairly similar concepts; both get you from A to B. How different are they when it comes to weight loss, then? Where do the differences between the two forms of exercise lie, and which one holds the title as the better weight loss aid?
Before comparing the two activities head-to-head, it is important to note that both are beneficial. Both running and walking are proven to offer cardiovascular benefits. Another fun fact is that they have been shown to reduce risk of cataracts with age. They are beneficial to bone density and, therefore, bone strength.

Calories Burned Per 1-Mile Walk vs 1-Mile Run For A 156-lb Person

Walk Calories Burned Per Mile: 88.9
Run Calories Burned Per Mile: 112.5
Walk Calories Burned Per Minute: 4.78
Run Calories Burned Per Minute: 11.25
Walk After-Burn Per Mile: 21.7
Run After-Burn Per Mile: 46.1

Which Burns More Calories?

Does running burn more calories than walking? Well, yes and no.
If you run for 20 minutes or walk for 50 minutes, you end up burning about the same amount of calories. But if you walk for 20 minutes or run for 20 minutes, running will create the biggest calorie deficit.
So I generally tell people, if you're short on time, kick up the intensity. If you've got more time, are more prone to injury or simply have an aversion to high-intensity activities, then go with a lower-intensity exercise, such as walking, biking or swimming. Just remember that the lower your exercise intensity, the lower the calorie expenditure, so how long you exercise becomes more important.

What’s So Great About Walking?

Walking has a few benefits that set it apart from running:
  • Walking is correlated with an even lower risk of high blood pressure, heart disease or diabetes than running
  • Walking is ideal for joints because it is a low-impact activity
  • Lower intensity exercise, such as walking (as opposed to running which is high-intensity), burns energy directly from fat stores

Then Why Bother Running?

Now, those are all great benefits, but that does not necessarily mean that they outweigh the benefits of running. Running stacks up pretty well in comparison:
  • Running is correlated with a lower BMI and waist circumference than walking
  • Running burns more calories per hour, making it more time-efficient than walking
  • Runners controlled their weight better, so they were able to maintain weight loss long-term
  • Running suppresses the appetite and regulates hunger hormones
  • Running causes a more lasting metabolism increase even after exercise has ended

How Running And Walking Match Up

So, which is the better exercise? At the end of the day, that is really a matter of personal decision. The most important factor to consider is that intensity doesn’t have a significant impact on weight loss if you are burning the same amount of calories.
Say you do a high intensity workout for a short period of time. You can likely burn the same amount of calories by doing a low intensity workout for a longer time. This means that you don’t necessarily have to go for a run to burn the calories, though running will be much more time efficient. A calorie is a calorie, and the subtle differences between running and walking are unlikely to add up much.
This is reassuring for those who can’t run, but you may not necessarily want to give up the time. Running is typically recommended for its time-efficiency and lasting metabolic benefits, so how can you make walking more efficient? A quick and easy fix for that dilemma is to do weighted walks or walk on an incline. Both of these strategies will benefit your workout by increasing effort and energy expenditure.

Conclusion

For those who seek more personal challenge or competition, running is the way to go. The satisfaction that comes with your first mile, your first 5K, etc. is unbeatable. It also isn’t hard to find local running groups that would quickly take you in as one of their own.
On the other hand, walking at a brisk pace is a good weight loss method that can also lend itself to a social time. Get together with friends or neighbors with similar goals or bring the dog out for a walk with you.
Finally, a mix of both walking and running can be a happy medium. It can also be a useful tool for transitioning from walking into running. Don’t feel restricted to one over the other. Make the decision that is best for you. Regardless of what it seems like everyone else is doing, the exercise that you are most likely to stick with is the one that you find most enjoyable.

Sunday, 24 July 2016

You've Been Pooping Wrong Your Entire Life And You Don't Even Know About It

They say life is lived when you're learning something. And as we all do know, there's enough to learn for us never to be able to complete the process of learning in our entire life! Some people learn the easy way, and some the hard way, through horrible accidents! 
But well, here's something to learn, but do brace yourself, because it's going to be a major shocker! You've been pooping the wrong way your entire life!
Read on to see why, and what the correct way is?

You've been pooping the wrong way since the day you were born! Can you even believe it?

Correct way to poop

Well, basically if you're a western person, then you've been doing your business the wrong way all this time. And here's the correct way to do it.

Correct way to poop

This gives you a good idea of where you've been going wrong? See, posture matters!

Correct way to poop

Scientists from the Pelvic Floor Clinic at Stanford University, are saying that our bodies are created in such way that makes it more natural for it to squat while we poop, rather than to sit.

Correct way to poop

Studies suggest that sitting while pooping can cause hernias, inflammatory bowel disease, colon cancer, diverticulosis, and haemorrhoids because of improper strain that it imparts.

Correct way to poop

In a 2003 study, the researchers divided random subjects into three groups, each into a different position, and studied the outcomes of their bathroom experiences.

Correct way to poop

The first group was sat on a lower toilet, the second group sat on a higher toilet, and the third group squatted, and results of their bathroom experiences were studied.

Correct way to poop

See now where you've been going so gravely wrong all these years? And it does make a lot of sense too, even as a layman, doesn't it?

Correct way to poop

Now that you know what's been wrong with your posture, you'd probably want to change your potty style, right? Well, here's a product that you might just find useful!

Correct way to poop

Thursday, 21 July 2016

This 14-Year-Old Indian Created An App To Help Fishermen Navigate, And Google Rewarded Him

We are probably breeding a generation of young geniuses in India.
Advay Ramesh, a 14-year-old Chennai resident, recently bagged a $10,000 reward from Google’s Community Impact Award for developing a GPS-powered app, FishErmen Lifeline Terminal (FELT), which is meant to help fishermen navigate safely in deep oceans.


Advay Ramesh.
Rameshwaram in South India recently witnessed a number of cases where fishermen went missing in the Indian Ocean and often ended up crossing the International Maritime Boundary with Sri Lanka. Advay understood the graveness of the matter when he personally spoke to fishermen on the coast.
He said:
“With limited space to do fishing, they tend to drift away knowingly or unknowingly and get into trouble. They also go 12-13 km further into the sea and stay overnight, so they need technology that is reliable and cheap.”


Screenshots of the FELT app.

Hence, to counter the problem, Advay started working with ISRO to create an app which would help fishermen determine their location and navigate their way back to their homes.

FELT will be using the indigenously-developed Indian Regional Navigation Satellite System (IRNSS) services to determine a fisherman’s location and will eventually be creating an emergency system based on it.  The  which is an open navigation service provided by the ISRO, will also be used for more accurate results.



As for future developments, Advay has plans to develop an alert system for the International Maritime Boundary which can track a fisherman’s entire path.
With new features, Advay not just aims to ensure the safety of these fishermen, but also give them more opportunities to increase their productivity by better planning systems.


After winning this reward and getting selected amongst 20 finalists from all over the world, Advay Ramesh is looking forward to bag the $50,000 scholarship at Google Science Fair 2016.

Ramesh’s idea was amongst the 100 top ideas in the world where Google sought to dig out innovative solutions to a problem impact environment and human resources.
A Google spokesperson said:
“Young minds are inventive, thoughtful, and determined to try things that other people think are ‘impossible.’ It’s imperative for us to support and encourage these young people to explore and challenge the world around them through scientific discovery.”
Advay’s brilliant idea, for that matter, is indeed unique and much needed on the coasts of India which lack major support for fishermen in the region.
Way to go, boy! 
Know more about Google Science Fair here.